"शिव बाबा की मुरली: आत्मा को शिक्षित करने वाला दिव्य पत्र"

 मुझे आध्यात्मिक अध्ययन का शौक था, लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि इसे कैसे शुरू करूं। किसी पर विश्वास भी नहीं था। मैंने शिव बाबा से कहा कि वही मुझे पढ़ाएं, और इस तरह पढ़ाएं जैसे स्कूल में पढ़ाया जाता है। यह बात पूरी हुई ब्रह्माकुमारी की मुरली से। अब रोज़ाना मुरली के माध्यम से पढ़ाई होती है। इसके अलावा, अन्य आध्यात्मिक व्याख्यान और अनुभवों से भी मैंने धीरे-धीरे सीखना शुरू किया।

मुरली तो शिव बाबा का पत्र लगता है मेरे लिए। मैं कोशिश करती हूं कि रोज़ाना इसे पढ़ूं। ज्ञान के साथ-साथ उसमें बाबा का प्यार भी महसूस होता है। चाहे मैं कैसी भी हूं, लेकिन बाबा के प्यार में कभी कोई कमी नहीं होती। मुरली में प्यार और दुलार भरे हुए शब्द होते हैं, साथ ही गहरे आध्यात्मिक ज्ञान की बातें भी।

इसके अलावा, मेरे मन में जो भी चलता रहता है—कोई परेशानी हो, कोई सवाल मन में हो—कई बार उसका जवाब भी मुरली से ही मिल जाता है। कोई और समझे या न समझे, लेकिन मैं मुरली पढ़ने या सुनने की रोज़ कोशिश करती हूं।

यह अनुभव ऐसा लगता है जैसे कोई स्कूल की क्लास हो। यह मेरे भारी मन को हल्का कर देता है। मुरली में नैतिक शिक्षा भी होती है—कैसे बात करें, किस तरह से बोलें, कितना बोलें, सबके साथ कैसे व्यवहार करें। इस तरह की मीठी शिक्षाएं मन को जैसे भर देती हैं। ऐसा लगता है, जैसे कोई बड़ा अपने असीम प्यार और दुलार के साथ छोटी-छोटी मीठी नैतिक बातें सिखा रहा हो।

मैंने तय किया है कि जब तक जीवन है, तब तक ऐसे ही इस ज्ञान को पढ़ते रहना है।

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